लेखक:
डॉ. संतोष कुमार
अससिस्टेंट प्रोफेसर , अंग्रेज़ी विभाग
डॉ अंबेडकर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ऊंचाहार रायबरेली
आज का युग सूचना और तकनीकी का युग है । इंटरनेट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ज्ञान प्राप्ति के तरीकों को पूरी तरह से बदल दिया है । कुछ ही सेकंड में विश्व की जानकारी हमारे स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती है । निःसंदेह, डिजिटल तकनीक ने शिक्षा, शोध और संवाद को सरल और त्वरित बना दिया है । फिर भी यह प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या डिजिटल माध्यम पुस्तक का स्थान ले सकता है ? इसका उत्तर स्पष्ट है नहीं ।
पुस्तकें केवल सूचना का स्रोत नहीं होतीं, बल्कि वे मनुष्य के विचार, संस्कार, कल्पनाशक्ति और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रांसिस बेकन ने कहा था”Reading maketh a full man.” अर्थात् अध्ययन मनुष्य को पूर्ण बनाता है। यह कथन आज के डिजिटल युग में और अधिक प्रासंगिक हो गया है।
डिजिटल माध्यम हमें त्वरित जानकारी तो देता है, परंतु गहन अध्ययन की आदत विकसित नहीं करता। मोबाइल और सोशल मीडिया पर उपलब्ध सामग्री अक्सर क्षणिक होती है, जिससे व्यक्ति का ध्यान बार-बार भटकता है। इसके विपरीत पुस्तकें धैर्य, एकाग्रता और गहराई से सोचने की क्षमता विकसित करती हैं। पुस्तक पढ़ते समय पाठक केवल शब्दों को नहीं पढ़ता, बल्कि लेखक के विचारों, अनुभवों और संवेदनाओं से भी जुड़ता है।
आज विद्यार्थियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती एकाग्रता की कमी है। अधिकांश छात्र किसी भी विषय का उत्तर इंटरनेट पर खोज लेते हैं, लेकिन विषय की गहराई को समझने का प्रयास कम करते हैं। परीक्षा की तैयारी भी नोट्स और वीडियो तक सीमित होती जा रही है। परिणामस्वरूप विश्लेषणात्मक सोच, लेखन कौशल और रचनात्मकता प्रभावित हो रही है। यदि विद्यार्थी नियमित रूप से पुस्तकों का अध्ययन करें तो उनका बौद्धिक विकास अधिक संतुलित और प्रभावी होगा।
पुस्तकें मनुष्य के चरित्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। महान साहित्य, जीवनियाँ, दर्शन और इतिहास हमें जीवन के मूल्यों, संघर्षों और सफलताओं से परिचित कराते हैं। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर, स्वामी विवेकानंद और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे महान व्यक्तित्वों ने पुस्तकों को अपने जीवन का सबसे बड़ा मार्गदर्शक माना। उनकी सफलता के पीछे सतत अध्ययन और ज्ञान के प्रति समर्पण था।
यह सत्य है कि ई-पुस्तकें और डिजिटल लाइब्रेरी आधुनिक शिक्षा की आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं। विश्व के अनेक देशों में अत्याधुनिक डिजिटल पुस्तकालय स्थापित किए जा रहे हैं। लेकिन इनका उद्देश्य पुस्तकों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक लोगों तक पहुँचाना है। पुस्तक चाहे मुद्रित रूप में हो या डिजिटल रूप में, उसका मूल उद्देश्य ज्ञान का प्रसार ही है। फिर भी मुद्रित पुस्तक को हाथ में लेकर पढ़ने का अनुभव मानसिक शांति और आत्मिक संतोष प्रदान करता है।
वर्तमान समय में मोबाइल फोन हमारी दिनचर्या का अभिन्न अंग बन चुका है। यदि इसका उपयोग सीमित और उद्देश्यपूर्ण हो तो यह अत्यंत उपयोगी साधन है। लेकिन जब यह अध्ययन की जगह मनोरंजन और समय की बर्बादी का माध्यम बन जाता है, तब यह हमारी एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए तकनीक का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना आवश्यक है।
एक सशक्त समाज का निर्माण केवल तकनीकी प्रगति से नहीं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और संवेदनशीलता से होता है। इन मूल्यों का विकास पुस्तकों के माध्यम से ही संभव है। पुस्तकें हमें केवल सफल नहीं बनातीं, बल्कि एक अच्छा नागरिक और बेहतर इंसान भी बनाती हैं। वे हमें सोचने, प्रश्न करने और सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती हैं।
नई शिक्षा नीति भी अनुभवात्मक और स्वाध्याय आधारित शिक्षा पर बल देती है। इसके लिए विद्यार्थियों में पुस्तक पढ़ने की आदत विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पुस्तकालयों को केवल पुस्तकों के संग्रहालय के रूप में नहीं, बल्कि विचारों और संवाद के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
अंततः यह कहा जा सकता है कि डिजिटल तकनीक और पुस्तकें एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक हैं। तकनीक गति प्रदान करती है, जबकि पुस्तकें गहराई देती हैं। तकनीक सूचना देती है, लेकिन पुस्तकें ज्ञान और विवेक प्रदान करती हैं। इसलिए यदि हमें एक जागरूक, संवेदनशील और विकसित समाज का निर्माण करना है तो डिजिटल साधनों के साथ-साथ पुस्तकों से अपना संबंध और अधिक मजबूत बनाना होगा।
“मोबाइल हमें जानकारी देता है, लेकिन पुस्तकें हमें समझ देती हैं; जानकारी जीवन को आसान बनाती है, जबकि समझ जीवन को सार्थक बनाती है।”
